सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि || 38||
सुख–सुख, दुःखे-दुःख में; समेकृत्वा-समभाव से; लाभ-अलाभौ लाभ तथा हानि; जय-अजयौ-विजय तथा पराजयः ततः-तत्पश्चात्; युद्धाय युद्ध के लिए; युज्यस्व-तैयार हो जाओ; न कभी नहीं; एवम्-इस प्रकार; पापम्-पाप; अवाप्स्यसि-अर्जित करोगे।
BG 2.38: कर्तव्यों के पालन हेतु युद्ध करो, युद्ध से मिलने वाले सुख-दुःख, लाभ-हानि को समान समझो। यदि तुम इस प्रकार अपने दायित्त्वों का निर्वहन करोगे तब तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा।
लौकिक स्तर पर अर्जुन को प्रेरित करने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब गहन कर्मयोग का ज्ञान प्रदान करने की ओर अग्रसर होते हैं। अर्जुन को यह भय था कि यदि वह युद्ध में अपने शत्रुओं का वध करता है तो उसे पाप लगेगा। श्रीकृष्ण उसके भय को दूर करते हैं। वे अर्जुन को उपदेश देते हैं कि वह फल की इच्छा किए बिना अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करे। इस प्रकार की मनोदशा के साथ कर्त्तव्य का पालन करने से उसे पाप लगने के भय से मुक्ति मिलेगी। जब हम स्वार्थ की भावना के साथ कार्य करते हैं तब हम कर्म का सृजन करते हैं जिसका हमें बाद में एक निश्चित परिणाम मिलता है। माठर स्मृति में वर्णित है:
पुण्येन पुण्य लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम्।
(माठर स्मृति)
"यदि तुम शुभ कर्म करते हो तब तुम स्वर्ग में जाओगे। यदि तुम अशुभ कर्म करोगे तब नरक में जाओगे और तुम शुभ और अशुभ दोनों कर्म करते हो तब तुम्हें पुनः मृत्यु लोक में वापस आना पड़ेगा।" इसलिए इन दोनों परिस्थितियों में हम अपने कर्मों के प्रतिफलों से बंधे हुए हैं। इसलिए शुभ लौकिक कर्म भी बंधन है और उनका फल भौतिक सुख है जिसके कारण हमारे कर्मों का संचयन बढ़ता है और हमारे इस भ्रम को और अधिक पुष्ट करता है कि इस संसार में सुख है। यदि हम स्वार्थ की कामना को त्याग देते हैं तब फिर हमारे कर्म परिणाम उत्पन्न नहीं करते।
उदाहरणार्थ हत्या करना एक पाप है और सभी देशों की न्यायिक व्यवस्थाओं में इसे दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है। किंतु यदि पुलिस का कोई सिपाही अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए डाकुओं के दल के सरदार को मार देता है तब उसे इसके लिए दंड नहीं मिलता है अपितु उसे उसकी वीरता के लिए पुरस्कार मिलता है। इसे दण्ड न मिलने का कारण यह है कि यह कार्य दुर्भावना और स्वार्थ की भावना से प्रेरित नहीं है और इसका निर्वहन देश के प्रति कर्त्तव्यों के पालन की दृष्टि से किया गया है। भगवान का विधान भी एकदम समान है। यदि कोई सभी प्रकार की कामनाओं का त्याग कर केवल कर्त्तव्य पालन के लिए कार्य करता है तब ऐसे कार्यों के परिणाम उत्पन्न नहीं होते हैं।
इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को परामर्श देते हैं कि वह युद्ध के परिणामों से विरक्त होकर केवल अपने कर्तव्यों के पालन की ओर ध्यान दे। जब वह समान भावना से युद्ध करेगा, विजय और पराजय तथा सुख-दुःख को एक समान समझेगा, तब अपने शत्रुओं का वध करने पर भी उसे पाप नहीं लगेगा।
इस विषय को बाद में भगवद्गीता के श्लोक 5.10 में भी दोहराया गया है। "जिस प्रकार कमल के पत्ते जल पर रहकर भी डाल को स्पर्श नहीं करते-उसी प्रकार से जो मनुष्य अपने सभी कर्मों को भगवान के प्रति अर्पित करता है और सभी प्रकार के मोह का त्याग कर देता है वह पाप से अछूता रहता।"
बिना आसक्ति के कर्म करने के परिणाम को समझाने के पश्चात् श्रीकृष्ण अब अपने द्वारा व्यक्त किए गए दिव्य वचनों में निहित तर्क को प्रकट करने के लिए कर्मयोग की विस्तार से व्याख्या करेंगे।
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि || 38||
कर्तव्यों के पालन हेतु युद्ध करो, युद्ध से मिलने वाले सुख-दुःख, लाभ-हानि को समान समझो। यदि तुम इस प्रकार अपने …
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